Chandauli : लक्ष्मी के तीन रूप- लक्ष्मी, महालक्ष्मी व अलक्ष्मी – अखिलानन्द

उत्तर प्रदेश
  • भव्य भंडारे के साथ श्रीमद् भागवत कथा का हुआ समापन
  • जीव के निष्काम भक्ति से भगवान उसके सुखदुख के हो जाते हैं साथी – अखिलानन्द

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.TheNewsTimes |. चंदौली : स्थानीय काली मंदिर के समीप स्थित अन्नपूर्णा वाटिका प्रांगण में संस्कृति संजीवनी सेवा संस्थान के तत्वावधान में चल रहे संगीतमयी सप्त दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा के विश्राम दिवस पर विशाल भंडारे में हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।

अंतिम दिवस की कथा का श्रवण कराते हुए व्यासपीठ से श्रीमद् भागवत व श्रीमानस मर्मज्ञ अखिलानंद जी महाराज ने भगवान कृष्ण के विवाह प्रसंग पर चर्चा करते हुए कहा कि रुक्मीणी जी लक्ष्मी स्वरूपा है जो नारायण का ही वरण करती हैं करती हैं। रूक्मीणी विवाह में शिशुपाल वर के रूप में आता है। भगवान कृष्ण जब द्वारिकापुरी से विदर्भ देश के कुंडिनपुर आते है तो जीतेन्द्रीय बन कर आते है और शिशुपाल कामी बनकर आता है।लक्ष्मी की प्राप्ति कामी नहीं बल्कि जीतेन्द्रीय को होती हैं। सांसारिक जीवों के लिए लक्ष्मी नारायण की है अर्थात वो हमारी मां है। लक्ष्मी को मां रूप में हम रखते हैं तो लक्ष्मी कल्याणकारी व सुख प्रदान करने वाली होती है शास्त्रों में लक्ष्मी के तीन स्वरूप बताए गये है। पहला लक्ष्मी दूसरा महालक्ष्मी और तीसरा अलक्ष्मी। लक्ष्मी स्वरूपा वो धन होता है जो धर्म व अधर्म दोनो प्रकार से होता है जो उसी में खर्च होता है। दूसरा महालक्ष्मी स्वरूपा वो धन जो केवल धर्म कार्य में खर्च होता है और तीसरा अलक्ष्मी जो अधर्म से आता है और अधर्म कार्य में ही खर्च होता है।

कहने का आशय यह है कि हम जिस प्रकार का धन प्राप्त करते हैं वह धन उसी कार्य में खर्च होता है।इसलिए मानव को यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि वह धर्म पूर्वक ही धन ग्रहण करें।भगवान श्री कृष्ण विवाह पर उन्होंने कहा कि द्वारिकाधीश का विवाह रूक्मीणी जी के साथ साथ जामवंती, सत्यभामा, लक्ष्मणा, कालिन्दी के साथ हुआ। भगवान विशेष रूप से भक्त के आधीन होते है सुदामा जी बालसखा भी है और परम भक्त भी। जीव यदि निष्काम भक्ति करता है तो भगवान उसके सुखदुख के साथी हो जाते है। भगवान सुदामा की दशा को देख कर अपनी करुणा द्वारा अनुग्रह करके अपने को धन्य करते है। इसीलिए सभी मार्गों में भक्ति मार्ग महाश्रेष्ठ बताया गया है। सुदामा जी सदैव धर्म का पालन करते हुए भगवान की आराधना करते है और ऐसा मानते है कि भगवान जैसे रखते हैं वैसे रहना चाहिए और उसे भगवान के शरणागत हो जाना चाहिए जबकि सुख में भगवान के कृपा की अनुभूति करनी चाहिए। कथा समापन पश्चात महाराज अखिलानंद जी का भक्तों द्वारा सम्मान करते हुए स्मृतिचिन्ह सहित विभिन्न उपहार प्रदान कर अभिनन्दन किया गया कथा समिति सहित उपस्थित अतिथियों को आशीर्वचन देते हुए महाराज ने सभी का सम्मान किया। तत्पश्चात भव्य भंडारा प्रारंभ हुआ जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु महिला पुरूष व बच्चों ने प्रसाद ग्रहण किया।

यजमान के रूप में यज्ञनारायण सिंह व पूनम सिंह, शैलेश तिवारी रहे। मौके पर मुख्य रूप से संस्था के उपेन्द्र सिंह, राजेश तिवारी,संजय तिवारी,पी एन सिंह,डा.एस एन त्रिवेदी, संजय अग्रवाल, दिनेश सिंह,बृजेश सिंह, संतोष पाठक, मनोज श्रीवास्तव, संतोष शर्मा, कन्हैया जायसवाल,बंटी सिंह, आलोक पाण्डेय, मिथलेश मिश्रा, अतुल दूबे, सुमित सिंह, विकास चौबे,बेचन पाण्डेय आदि सहित अन्य लोगों द्वारा भंडारे में सहयोग कर श्रीमद् भागवत कथा की पुर्णाहुति करायी गयी।

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